All Categories

sher shah suri( 1540 1545 AD ),sher shah,sher shah suri in hindi

sher shah suri( 1540 1545 AD ),sher shah,sher shah suri in hindi

शेरशाह सूरी ( 1540 1545 ई . )

  • शेरशाह सूरी ( शेर खाँ ) दिल्ली के सिंहासन पर 67 साल की आयु में बैठा । उसका मूल नाम फरीद था तथा उसके पिता हसन खाँ जौनपुर के एक छोटे से जागीरदार थे ।
फरीद को शेर खाँ का खिताब उसके संरक्षक एक शर का मारने पर दिया था । 
  • मुहम्मद शाह  ( बहार खां लोहानी ) की मृत्यु के बाद शेर खाँ ने उसकी विधवा दूदू बेगम से विवाह कर लिया और दक्षिण बिहार का शासक बन गया इतना प्रभावित
  • शेरशाह सूरी ने मुहम्मद – बिन – तुगलक की मृत्यु के पश्चात् उत्तर भारत में स्थापित सबसे बड़े साम्राज्य पर शासन किया । उसका साम्राज्य बंगाल से लेकर सिंधु नदी तक ( कश्मीर को छोड़ कर ) फैला हुआ था । पश्चिम में उसने मालवा और लगभग पूरे राजस्थान को जीत लिया था ।
  • 1532 ई . में मारवाड़ की गद्दी पर बैठने वाले राजा मालदेव ने बहुत तेजी से सम्पूर्ण पश्चिमी और उत्तरी राजपूताना पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था ।
शेरशाह मारवाड़ के युद्ध में राजपूतों के शौर्य से हुआ कि , उसने कहा- मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए लगभग हिन्दुस्तान का साम्राज्य खो चुका था ।
  • राजपूत और अफगान सेनाओं के साथ युद्ध ( 1544 ई . ) अजमेर और जोधपुर के मध्य सामेल नामक स्थान पर हुआ था । दस महीनों की अल्प अवधि में ही शेरशाह ने लगभग पूरे राजस्थान को अपने अधीन कर लिया ।
  • उसका आखिरी सैनिक अभियान कालिंजर के विरुद्ध था । कालिंजर की घेराबंदी के दौरान उक्का नामक आग्नेय अस्त्र चलाने के दौरान शेरशाह बुरी तरह से घायल हो गया था ।
  • किले पर अधिकार हो जाने की खबर सुनने के बाद ( 1545 ई . ) उसकी मृत्यु हो गयी ।
  • शेरशाह सूरी का दूसरा बेटा इस्लाम शाह सिंहासन पर बैठा । उसने 1553 ई . तक शासन किया ।
  • इस्लामशाह की मुत्यु के बाद अफगान अमीरों ने मृत सुल्तान के नाबालिग ( 12 वर्ष ) पुत्र फिरोज को सुल्तान घोषित कर दिया । उसका राज्याभिषेक ग्वालियर में हुआ वह केवल तीन दिनों का बादशाह बन सका ।
  • मुबारिज खाँ ने अल्पवयस्क सुल्तान की हत्या कर दी और स्वयं मुहम्मदशाह आदिल के नाम से सुल्तान बन गया ।

शेरशाह की देन

  • अपने साम्राज्य के एक छोर से दूसरे छोर तक शांति – व्यवस्था की पुनर्स्थापना शेरशाह का एक प्रमुख योगदान था ।
  • शेरशाह ने अपने राज्य में वाणिज्य – व्यापार के उत्थान और संचार – सुविधाओं के सुधार की ओर विशेष ध्यान दिया ।
  • उसने पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर बंगाल में सोनार गाँव तक पहुंचने वाली पुरानी शाही सड़क ( जिसे ग्रैन्ड ट्रंक रोड कहा जाता है ) को पुनः शुरू करवाया , जिसे प्राचीन भारत में उत्तरापथ कहते थे ।
  • लार्ड डलहौजी ने इसका नाम बदलकर जी . टी . रोड रखा था , वर्तमान में यह NH – 1 व NH – 2 के नाम से जानी जाती है ।
  • उसने आगरा से जोधपुर व चित्तौड़ तक सड़क बनवाई । एक अन्य सड़क उसने लाहौर से मुल्तान तक बनवाई थी ।
  • यात्रियों की सुविधा के लिए उसने इन सड़कों पर लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर सरायें बनवाई ।
अब्बास खाँ सरवानी ने कहा था कि , इन सगयों का यह नियम था कि , इनमें जो भी दाखिल होता था , उसे सरकार की ओर से अपनी पद – प्रतिष्ठा के अनुरूप सुविधाएँ , भोजन और उसके पशु क लिए चारा दिया जाता था ।
  • शेरशाह सूरी ने कुल 1700 सरायें बनवाई । शेरशाह द्वारा बनवाई गयी सड़कों और सरायों को साम्राज्य की धमनियाँ कहा गया है । बहुत – सी सरायें बाजार – बस्तियों के रूप में विकसित हुईं , जिन्हें कस्बा कहा जाता था । सरायों का उपयोग समाचार – सेवाओं के लिए अर्थात् डाक – चौकियों के लिए भी किया जाता था
  • शेरशाह ने वाणिज्य और व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए और भी सुधार किए । उसके सम्पूर्ण साम्राज्य में व्यापार के माल पर सिर्फ दो स्थानों में चुगी लगती थी ।
  • किसी व्यापारी की मृत्यु हो जाने पर लोगों को उसकी वस्तुओं को लावारिस मान कर उन पर कब्जा करना अपराध माना गया था ।
  • शेरशाह ने स्पष्ट कर दिया कि , किसी व्यापारी की जो भी क्षति होगी , उसकी जिम्मेदारी स्थानीय मुकद्दमों और जमींदारों की होगी ।
अब्बास खाँ सरवानी की व्यंग्यपूर्ण भाषा में कहें तो कोई जर्जर बूढी औरत भी अपने सिर पर सोने के गहनों से भरी टोकरी रख कर यात्रा पर निकल जाती थी तो शेरशाह द्वारा दी जाने वाली सजा के भय से कोई भी चोर – डाकू उसके पास फटकने की हिम्मत नहीं कर सकता था ।
  • उसने मिश्र धातु के निम्न कोटि के सिक्कों के स्थान पर सोने , चाँदी और ताँबे के मानक सिक्के ढलवाए । उसके चाँदी के सिक्के इतनी अच्छी तरह ढले हुए थे कि , वे उसकी मृत्यु के बाद भी सदियों तक मानक सिक्कों के रूप में चलते रहे ।
  • शेरशाह ने सल्तनत काल से प्रचलित प्रशासनिक विभाजनों में बहुत परिवर्तन नहीं किए । कई गाँवों को मिला कर एक परगना बनता था । परगना शिकदार के जिम्मे होता था , जो शांति – व्यवस्था का ध्यान रखता था ।
  • मुंसिफ या आमिल भू – राजस्व की उगाही की निगरानी करता था । लेखा – जोखा ( हिसाब – किताब ) फारसी और स्थानीय भाषा ( हिंदवी ) दोनों में रखे जाते थे । परगना से ऊपर की इकाई शिक या सरकार थी , जो शिकदार – ए – शिकदारान और एक मुंसिफ – ए – मुंसिफान के अन्तर्गत होती थी ।
  • राज्य का हिस्सा उपज का एक – तिहाई था । जमीन को उत्तम , मध्यम और निम्न इन तीन दर्जी में बाँट दिया गया था तथा लगान इन तीनों श्रेणियों के अलग – अलग औसत उत्पादन के आधार पर तय किया गया था ।
  • बोई गयी जमीन के क्षेत्रफल , लगाई गयी फसलों की किस्में और प्रत्येक किसान द्वारा देय लगान एक कागज में दर्ज होता था , जिसे पट्टा कहते थे ।
  • अपने विस्तृत साम्राज्य को संभालने के लिए शेरशाह ने एक शक्तिशाली सेना खड़ी की । उसने सिपाहियों की सीधी भर्ती का कार्यक्रम शुरू कर दिया । जिसके लिए प्रत्येक रंगरूट के चरित्र की जाँच की जाती थी । प्रत्येक सिपाही का पूरा व्यक्तिगत वर्णन दर्ज रहता था , जिसे चेहरा कहते थे ।
  • शेरशाह की खास सेना में 1,50,000 घुड़सवार और 25,000 पैदल सैनिक शामिल बताए जाते हैं । ये लोग तोड़ेदार बंदूकों या धनुषों से सज्जित होते थे ।
  • न्याय पर शेरशाह का बहुत जोर रहता था । अलग – अलग स्थानों में न्याय करने के लिए काजी नियुक्त किए जाते थे । लेकिन गाँवों में पहले की तरह फौजदारी और दीवानी दोनों के मामलों का निपटारा स्थानीय तौर पर पंचायतें और जमींदार करते थे ।
  • उसने सासाराम ( बिहार ) में अपने लिए मकबरा बनवाया , जो स्थापत्य का एक उत्कृष्ट नमूना माना जाता है ।
  • शेरशाह ने दिल्ली के निकट यमुना के किनारे एक नया नगर भी बसाया । अब उसमें केवल पुराना किला और उसके अंदर बनी एक मस्जिद सुरक्षित हैं ।
  • शेरशाह ने विद्वानों को भी संरक्षण दिया । उनमें से एक मलिक मुहम्मद जायसी था , जिसने पद्मावत नामक काव्य ग्रंथ की रचना की । यद्यपि यह शेरशाह के संरक्षण में नहीं था ।
  • शेरशाह ने सम्पूर्ण साम्राज्य से उत्पादन का 1/3 भाग कर के रूप में लिया । जबकि मुल्तान से उपज का ¼ हिस्सा लगान के रूप में वसूला जाता था । शेरशाह ने भूमि की माप के लिए सिकन्दरी गज 34 अंगुल या 32 इंच एवं सन की डंडी का प्रयोग करवाया था ।
  • शेरशाह की मुद्रा व्यवस्था अत्यन्त विकसित थी । उसने पुराने घिसे पिटे सिक्कों के स्थान पर शुद्ध चाँदी का रुपया ( 180 ग्रेन ) और ताँबे का दाम ( 380 ग्रेन ) चलाया ।
  • शेरशाह के समय में 23 टकसालें थीं । शेरशाह के सिक्कों पर शेरशाह का नाम और पद अरबी या नागरी लिपि में अंकित होता था ।
  • शेरशाह द्वारा रुपये के बारे में स्मिथ ने लिखा है- यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली का आधार है ।
  • मालगुजारी ( लगान ) के अतिरिक्त किसानों को जरीबाना ( सर्वेक्षण – शुल्क ) एवं महासिलाना ( कर – संग्रह शुल्क ) नामक कर देने पड़ते थे , जो क्रमशः भूराजस्व का 2.5 प्रतिशत

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *